Monthly Archives: September 2012

राजभाषा हिंदी पखवाड़ा समापन समारोह २००१२

दिनांक २८.०९.२०१२ को विद्यालय प्रांगण में दिनांक १४.०९.२०१२ से प्रारंभ हुए “राजभाषा हिंदी पखवाड़ा समापन समारोह २००१२” अत्यंत हर्षोल्लास एवें विविध कार्यक्रमों के मंचन के साथ संपन्न हुआ| आज के इस समापन समारोह कार्यक्रम पर बतौर मुख्य अतिथि श्रीमती हिरन वैश्य (सहायक प्रोफ़ेसर) हिंदी विभाग, दुमदुमा कालेज उपस्थित थीं| विशिष्ठ अतिथि के रूप अध्यक्ष-विद्यालय प्रबंधन समिति भी कार्यक्रम में उपस्थित हुए| कार्यक्रम के प्रारंभ में विद्यालय की वरिष्ठतम प्राथमिक शिक्षिका श्रीमती सी. मोहंता ने फूलों का गुलदस्ता भेंट कर अतिथियों का स्वागत किया| कार्यक्रम में स्वरचित कविता पाठ प्रतियोगिता के विजेता चयनित प्रतिभागियों द्वारा काव्य-पाठ किया गया| पूरे १५ दिवसीय पखवाड़े में हुई समस्त प्रतियोगिताओं (विद्यार्थियों एवं शिक्षकों हेतु)में विजयी हुए प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि एवं विशिष्ठ अतिथि के कर कमलों द्वारा पुरस्कार वितरित किये गए| भाषा के उन्नयन हेतु समर्पित गैर-हिंदी भाषी प्रान्तों से सम्बंधित होकर भी विभिन्न हिंदी प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन हेतु भी “सांत्वना पुरस्कार ” वितरित किये गए| इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्रीमती हिरन वैश्य ने अपने वक्तव्य में विद्यार्थियों से हिंदी भाषा के लेखन और भाषण की महत्ता पर प्रकाश डाला साथ ही साथ अपने लयबद्ध एवं मधुर स्वर में हिंदी की रोचक कविताएं सुना कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया| कार्यक्रम के अंत में समापन की घोषणा की गयी और अंत में राष्ट्रगान के साथ समारोह संपन्न हुआ| पुरस्कार वितरण व्यस्था की देख रेख श्री नरेन्द्र कुमार (संस्कृत अध्यापक), श्रीमती चंदना मोहंता (प्राथमिक शिक्षिका) द्वारा की गयी| समस्त कार्यक्रम सकुशल संपन्न हो सके इसकी सुनियोजित कार्ययोजना संयोजक श्री मनोज सिंह (प्राचार्य) एवं विद्यालय स्तरीय राजभाषा समिति के सदस्यों के परामर्श द्वारा निर्धारित की गयी| मंच का संचालन एवं उद्घोषणा की कार्यवाही पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा की गई| कार्यक्रम के मध्य अनुशासन व्यवस्था की देख-रेख समस्त कक्षाध्यापक कर रहे थे| ध्वनि एवं माइक व्यस्था श्री लक्ष्मण सिंह जी (कार्य अनुभव शिक्षक) देख रहे थे| इस अवसर पर समस्त विद्यालय परिवार उपस्थित था|

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“हिंदी को कैसे आगे बढायें” विषय पर आधारित “संगोष्ठी”

दिनांक २१.०९.२०१२ को विद्यालय प्रांगण में “हिंदी को कैसे आगे बढायें” विषय पर आधारित एक “संगोष्ठी” का आयोजन किया गया| इस संगोष्ठी में विद्यालय परिवार के सारे सदस्य उपस्थित हुए| कार्यक्रम में मुख्य वक्ता थे श्री मनोज कुमार सिंह (परास्नातक अध्यापक हिंदी)| अन्य वक्ताओं में श्री नरेन्द्र कुमार, श्री विजय प्रकाश, श्री देवेंदर कुमार, श्री के.आर.गौरखेडे, श्रीमती चंदना मोहंता, श्रीमती राजकुमारी रेखा सिंह,

श्री आनंद यादव, श्री नरेन्द्र मांडले, श्री जीतेन्द्र आचार्य, श्री शैलेश शाह , श्री जीतेन्द्र कुमार इत्यादि थे| कार्यक्रम में श्री नितिन कुमार अविरल (परास्नातक अध्यापक संगणक विज्ञान) ने कंप्यूटर पर हिंदी में कार्य करने हेतु जानकारी प्रदान की| पूरे दो घंटे चली इस परिचर्चा गोष्ठी में हिंदी भाषा में काम- काज करने पर बल देने पर विमर्श हुआ साथ ही इसका प्रचार प्रसार करने पर भी जोर दिया गया| सबसे ज्यादा जोर हिंदी के तकनीकी प्रयोग पर किया गया| इसकार्यक्रम का संचालन विद्यालय पुस्तकालयाध्यक्ष ने किया|
इस कार्यक्रम की समस्त गतिविधियों के फोटो देखने हेतु निचे दिये गये स्लाइड शो  पर क्लिक करें|

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हिंदी दिवस पर माननीय उपायुक्त श्री अजय पंत का संदेश

 

 

हिंदी दिवस के अवसर पर माननीय उपायुक्त श्री अजय पंत का संदेश

संदेश हमारी भाषा हमारे गौरव का आधार है। जब हम कहते हैं मातृभाषा तब उसका अर्थ उस भाषा से होता है जिसमें हमने बोलना और चलना सीखा। हर देश की अपनी मातृभाषा होती है जिस पर वह गर्व करता है। विकासशील और मीठी बातें किसी भी भाषा में अच्छी लगती हैं और कटु तथा अप्रिय बातें किसी भी भाषा में खटकती हैं। हम अपनी मातृभाषा हिंदी के बहुआयामी प्रयोग के लिए प्रयासरत हैं। यहाँ किसी भाषा को छोटा-बड़ा कहने या भाषा की प्रतिद्वंदिता की बात नहीं है बल्कि अपनी मातृभाषा को गरिमा देने की बात है। किसी भी आदमी के लिए अधिक से अधिक भाषाएँ सीखना गरिमा व महत्व की बात है लेकिन यदि वह अपनी मातृभाषा ही भूल जाय या उसे महत्वहीन समझे तो उसके समस्त ज्ञान आधारहीन होगा। यदि हम आस-पड़ोस, रिश्तेदारों तथा समस्त विश्व को बंधुत्व की नज़र से देखें तो यह विस्तृत हृदय और मानसिकता का द्योतक है लेकिन यदि अपने ही कुटुंब के प्रति हीन भावना प्रदर्शित करें तो यह सर्वथा अनुचित होगा। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस हीन भावना से उबरने की है। इतिहास गवाह है कि विश्व के अग्रणी व विकसित देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, चीन आदि सभी ने अपनी मातृभाषा में ही कार्य करके उन्नति पायी है। इन्होंने अपनी भाषा पर गर्व करते हुए सूक्ष्म एवं तकनीकि ज्ञान को अपनी भाषा में उपलब्ध करवाने का चुनौतीपूर्ण कार्य संपन्न किया। हमारे केन्द्रीय विद्यालय दिशा निर्धारक होने के फलस्वरूप पूरे देश में कार्यरत हैं और समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करते हैं। मातृभाषा का का विकास और विस्तार करना हमारा एक महत्वपूर्ण दायित्व है। इस वर्ष का हिंदी पखवाड़ा हम सभी के लिए एक सुनहरा अवसर है कि हम अपने को अपनी मृदुल मातृभाषा के प्रति पुन: आत्मार्पित करें। इस अवसर पर केन्द्रीय विद्यालय संगठन परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएँ!

-अजय पंत  उपायुक्त केन्द्रीय विद्यालय संगठन तिनसुकिया संभाग

 

 

 

 

 

दो दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी

इस दो दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी की झलकियाँ देखने के लिए नीचे दिए गए स्लाइड शो पर क्लिक करें|

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आज दिनांक १४.०९.२०१२ को विद्यालय पुस्तकालय में और हिंदी साहित्य और कार्यालयी विषयों से सम्बंधित हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों/शब्दावलियों एवं पत्रिकाओं  की दो दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी का प्रारंभ किया गया| कार्यक्रम का उद्घाटन  श्री मनोज कु. सिंह (प्रभारी प्राचार्य) द्वारा फीता कट कर किया गया | इस अवसर पर  शिक्षकों में श्री पंकज सैनी (पी.जी.टी. भातिक वि.), श्री कमलाकर राजेराम गौरखेड़े (टी.जी.टी. अंग्रेजी), श्री नरेन्द्र कुमार (टी.जी.टी. संस्कृत ), श्री विजय प्रकाश (पी.आर.टी.), श्रीमती राजकुमारी रेखा सिंह (पी.आर.टी.), श्रीमती सुप्ता सुत्रधर(पी.आर.टी.), श्री नरेन्द्र मांडले (पी.आर.टी. संगीत ), श्री जितेन्द्र कुमार (पी.जी.टी. गणित), श्री जितेन्द्र कु. आचार्य (पी.जी.टी. जीव विज्ञान), श्री नाओरेम मोमो सिंह (टी.जी.टी. पी&एच.ई.), श्री सृजन  सिंह (टी.जी.टी. गणित ), श्री लक्ष्मण सिंह (टी.जी.टी. कार्य अनुभव), श्री अमरजीत महतो (टी.जी.टी. कला, विद्यार्थी तथा अन्य लोग उपस्थित हुए| आगंतुकों ने विद्यालय पुस्तकालय में आयोजित इस दो दिवसीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित पुस्तकों तथा पत्रिकाओं का अवलोकन किया | कार्यक्रम आयोजक पुस्तकालयाध्यक्ष ने इस प्रदर्शनी के संचालन के साथ -साथ समस्त आगंतुकों को पुस्तकालय में उपलब्ध अन्य पुस्तकों तथा सेवाओं के बारे में भी विस्तृत  जानकारी दी| दो दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी  के पहले दिन प्रातः १० बजे से प्रारंभ हुई और  दोपहर २.०० बजे तक दर्शकों का आवागमन जारी रहा |

हिंदी पखवाडा २०१२

आज दिनांक १४.०९.२०१२ को प्रातः कालीन सभा में राजभाषा हिंदी पखवाडा (१४.०९.२०१२ से २८.०९.२०१२ ) का प्रारंभ हुआ | इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि विद्यालय के चेयरमैन श्री एस.एम्.मेहता और उनके साथ  श्री आर.एन.साहू उपस्थित थे | कार्यक्रम का प्रारंभ श्री एस.एम्.मेहता ने दीप प्रज्वलित कर के किया | इस अवसर पर श्री मनोज कुमार सिंह (प्राचार्य ), श्री पी.सी.यादव (टी.जी.टी. सामाजिक विज्ञान) और विद्यार्थियों  ने अपने विचार व्यक्त किये| श्री मेहता ने अपने भाषण में विद्यार्थियों से हिंदी भाषा की उन्नति के लिए कार्य  करने को कहा और अपने द्वारा रचित कविताओं का पाठ भी किया | श्री साहू ने भी अपने भाषण में हिंदी के प्रचार प्रसार पर बल देते हुए विद्यार्थियों से शब्दों के संग्रह और नए शब्दों को सिखने का आह्वान किया| प्राथमिक विभाग के विद्यार्थियों ने इस अवसर पर कविता पाठ किया | कार्यक्रम का संचालन श्री संजय कुमार  (पुस्तकालयाध्यक्ष ) द्वारा किया गया | कार्यक्रम में इस अवसर पर  शिक्षकों में श्री नरेन्द्र कुमार (टी.जी.टी. संस्कृत ), श्री नाओरेम मोमो सिंह (टी.जी.टी. पी&एच.ई.), श्री सृजन  सिंह (टी.जी.टी. गणित ),श्री विजय प्रकाश (पी.आर.टी.), श्री पंकज सैनी (पी.जी.टी. भातिक वि.), श्री कमलाकर राजेराम गौरखेड़े (टी.जी.टी. अंग्रेजी), श्रीमती राजकुमारी रेखा सिंह (पी.आर.टी.), श्रीमती सुप्ता सुत्रधर(पी.आर.टी.), श्री नरेन्द्र मांडले (पी.आर.टी. संगीत ), श्री जितेन्द्र कुमार (पी.जी.टी. गणित), श्री जितेन्द्र कु. आचार्य (पी.जी.टी. जीव विज्ञान),श्री लक्ष्मण सिंह (टी.जी.टी. कार्य अनुभव), श्री अमरजीत महतो (टी.जी.टी. कला, विद्यार्थी तथा पूरा विद्यालय परिवार उपस्थित था |

विद्यालय चेयरमैन दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए

इस उद्घाटन समारोह की झलकियाँ देखने के लिए नीचे दिए गए स्लाइड शो पर क्लिक करें|

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओं, आनंददायी अभिव्यक्ति और हंसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। वे छात्रों को प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे।पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती प्रतिवर्ष 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। इन दिनों जब शिक्षा की गुणात्मकता का ह्रास होता जा रहा है और गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण लगता जा रहा है, उनका पुण्य स्मरण फिर एक नई चेतना पैदा कर सकता है। सन्‌ 1962 में जब वे राष्ट्रपति बने थे, तब कुछ शिष्य और प्रशंसक उनके पास गए थे। उन्होंने उनसे निवेदन किया था कि वे उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने से निश्चय ही मैं अपने को गौरवान्वित अनुभव करूंगा।’ तब से 5 सितंबर सारे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. राधाकृष्णन ने जो अमूल्य योगदान दिया वह निश्चय ही अविस्मरणीय रहेगा। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। यद्यपि वे एक जाने-माने विद्वान, शिक्षक, वक्ता, प्रशासक, राजनयिक, देशभक्त और शिक्षा शास्त्री थे, तथापि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अनेक उच्च पदों पर कामकरते हुए भी शिक्षा के क्षेत्र में सतत योगदान करते रहे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। डॉ. राधाकृष्णन कहा करते थे कि मात्र जानकारियां देना शिक्षा नहीं है। यद्यपि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीक की जानकारी महत्वपूर्ण भी है तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतांत्रिक भावना का भी बड़ा महत्व है। ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती हैं। शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति। वह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है। करुणा, प्रेमऔर श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने अनेक वर्षों तक अध्यापन किया। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। उनका कहना था कि शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हों। शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्यापन करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर अर्जित करना चाहिए। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।शिक्षक का काम है ज्ञान को एकत्र करना या प्राप्त करना और फिर उसे बांटना। उसे ज्ञान का दीपक बनकर चारों तरफ अपना प्रकाश विकीर्ण करना चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की उक्ति को उसे अपने जीवन में चरितार्थ करना चाहिए। उसकी ज्ञान गंगा सदा प्रवाहित होती रहनी चाहिए। उसे ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः/ गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः’ वाले श्लोक को चरितार्थ करके दिखाना चाहिए। इस श्लोक में गुरु को भगवान के समान कहा गया है।वे कहते थे कि विश्वविद्यालय गंगा-यमुना के संगम की तरह शिक्षकों और छात्रों के पवित्र संगम हैं। बड़े-बड़े भवन और साधन सामग्री उतने महत्वपूर्ण नहीं होते, जितने महान शिक्षक। विश्वविद्यालय जानकारी बेचने की दुकान नहीं हैं, वे ऐसे तीर्थस्थल हैं जिनमें स्नान करने से व्यक्ति को बुद्धि, इच्छा और भावना का परिष्कार और आचरण का संस्कार होता है। विश्वविद्यालय बौद्धिक जीवन के देवालय हैं, उनकी आत्मा है ज्ञान की शोध। वे संस्कृति के तीर्थ और स्वतंत्रता के दुर्ग हैं।उनके अनुसार उच्च शिक्षा का काम है साहित्य, कला और व्यापार-व्यवसाय को कुशल नेतृत्व उपलब्ध कराना। उसे मस्तिष्क को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि मानव ऊर्जा और भौतिक संसाधनों में सामंजस्य पैदा किया जा सके।डॉ. राधाकृष्णन के जीवन पर महात्मा गांधी का पर्याप्त प्रभाव पड़ा था। सन्‌ 1929 में जब वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में थे तब उन्होंने ‘गांधी और टैगोर’ शीर्षक वाला एक लेख लिखा था। वह कलकत्ता के ‘कलकत्ता रिव्यू’ नामक पत्र में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने गांधी अभिनंदन ग्रंथ का संपादन भी किया था। इस ग्रंथ के लिए उन्होंने अलबर्ट आइंस्टीन, पर्ल बक और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे चोटी के विद्वानों से लेख प्राप्त किए थे। इस ग्रंथ का नाम था ‘एन इंट्रोडक्शन टू महात्मा गांधी : एसेज एंड रिफ्लेक्शन्स ऑन गांधीज लाइफ एंड वर्क।’ इस ग्रंथ को उन्होंने गांधीजी को उनकी 70वीं वर्षगांठ पर भेंट किया था।अमरीका में भारतीय दर्शन पर उनके व्याख्यान बहुत सराहे गए। उन्हीं से प्रभावित होकर सन्‌ 1929-30 में उन्हें मेनचेस्टर कॉलेज में प्राचार्य का पद ग्रहण करने को बुलाया गया। मेनचेस्टर और लंदन विश्वविद्यालय में धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन पर दिए गए उनके भाषणों को सुनकर प्रसिद्ध दार्शनिक बर्टरेंट रसेल ने कहा था, ‘मैंने अपने जीवन में पहले कभी इतने अच्छे भाषण नहीं सुने। उनके व्याख्यानों को एच.एन. स्पालिंग ने भी सुना था।उनके व्यक्तित्व और विद्वत्ता से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में धर्म और नीतिशास्त्र विषय पर एकचेअर की स्थापना की और उसे सुशोभित करने के लिए डॉ. राधाकृष्ण को सादर आमंत्रित किया। सन्‌ 1939 में जब वे ऑक्सफोर्ड से लौटकर कलकत्ता आए तो पंडित मदनमोहन मालवीय ने उनसे अनुरोध किया कि वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का पद सुशोभित करें। पहले उन्होंने बनारस आ सकने में असमर्थता व्यक्त की लेकिन अब मालवीयजी ने बार-बार आग्रह किया तो उन्होंने उनकी बात मान ली। मालवीयजी के इस प्रयास की चारों ओर प्रशंसा हुई थी।सन्‌ 1962 में वे भारत के राष्ट्रपति चुने गए। उन दिनों राष्ट्रपति का वेतन 10 हजार रुपए मासिक था लेकिन प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मात्र ढाई हजार रुपए ही लेते थे और शेष राशि प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष में जमा करा देते थे। डॉ. राधाकृष्णन ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की इस गौरवशाली परंपरा को जारी रखा। देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर भी वे सादगीभरा जीवन बिताते रहे। 17 अप्रैल 1975 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया तथापि उनके विचार वर्षों तक हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

मूल लेखक -बाबूराव जोशी

साभार:http://hindi.webdunia.com